संदेश

जून, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः"

चित्र
"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" : हर दिशा से आने वाले शुभ विचारों का स्वागत करें "एक दीपक दूसरे दीपक से प्रकाश लेता है, लेकिन उसका प्रकाश कम नहीं होता। ज्ञान भी ऐसा ही है—जितना बाँटो, उतना बढ़ता है।" संस्कृत मंत्र "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" — ऋग्वेद (1.89.1) हिन्दी अर्थ "हमारे पास संसार की सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार और श्रेष्ठ ज्ञान आते रहें।" कितना अद्भुत विचार है! हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषियों ने यह नहीं कहा कि केवल हमारी ही बात सत्य है, केवल हमारा ही ज्ञान श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा— "जहाँ कहीं से भी अच्छे विचार मिलें, उन्हें स्वीकार करो।" यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। **"ज्ञान का कोई धर्म नहीं होता, सत्य का कोई देश नहीं होता।"** अक्सर मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अज्ञान नहीं होती, बल्कि यह भ्रम होता है कि "मैं सब जानता हूँ।" जब व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, तब उसका विकास भी रुक जाता है। एक बंद खिड़की में ताज़ी हवा नहीं आ सकती। वैसे ही बंद मन में नए विचार प्रवेश नहीं कर सक...

अनुगच्छतु प्रवाह

चित्र
अनुगच्छतु प्रवाह : जीवन का प्रवाह रोकना नहीं, समझना सीखो "नदी कभी पहाड़ों से लड़कर समुद्र तक नहीं पहुंचती, वह रास्ता बनाते हुए बहती रहती है।" "अनुगच्छतु प्रवाह" अर्थात् — प्रवाह के साथ चलो। यह संस्कृत का छोटा सा वाक्य है, लेकिन अपने भीतर जीवन का एक गहरा रहस्य छुपाए हुए है। अक्सर हमने देखा है कि जब भी जीवन हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता, हम बेचैन हो जाते हैं। नौकरी न मिले तो दुख, रिश्ता टूट जाए तो दुख, योजना असफल हो जाए तो दुख। हम जीवन से लड़ने लगते हैं। लेकिन प्रकृति का नियम कुछ और कहता है। नदी को देखिए। जब उसके रास्ते में चट्टान आती है तो वह चट्टान से युद्ध नहीं करती। वह अपना मार्ग बदल लेती है, लेकिन बहना नहीं छोड़ती। और अंततः वही नदी समुद्र तक पहुँच जाती है। **"जो झुकता है वही टिकता है, जो बहता है वही बढ़ता है।"** मुझे अक्सर बाँस के वृक्ष का उदाहरण याद आता है। आंधी आने पर विशाल वृक्ष टूट जाते हैं, लेकिन बाँस झुक जाता है। आंधी के बाद वह फिर सीधा खड़ा हो जाता है। जीवन में भी जो परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं, वे टूट...