"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः"
"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" : हर दिशा से आने वाले शुभ विचारों का स्वागत करें "एक दीपक दूसरे दीपक से प्रकाश लेता है, लेकिन उसका प्रकाश कम नहीं होता। ज्ञान भी ऐसा ही है—जितना बाँटो, उतना बढ़ता है।" संस्कृत मंत्र "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" — ऋग्वेद (1.89.1) हिन्दी अर्थ "हमारे पास संसार की सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार और श्रेष्ठ ज्ञान आते रहें।" कितना अद्भुत विचार है! हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषियों ने यह नहीं कहा कि केवल हमारी ही बात सत्य है, केवल हमारा ही ज्ञान श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा— "जहाँ कहीं से भी अच्छे विचार मिलें, उन्हें स्वीकार करो।" यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। **"ज्ञान का कोई धर्म नहीं होता, सत्य का कोई देश नहीं होता।"** अक्सर मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अज्ञान नहीं होती, बल्कि यह भ्रम होता है कि "मैं सब जानता हूँ।" जब व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, तब उसका विकास भी रुक जाता है। एक बंद खिड़की में ताज़ी हवा नहीं आ सकती। वैसे ही बंद मन में नए विचार प्रवेश नहीं कर सक...