अनुगच्छतु प्रवाह

अनुगच्छतु प्रवाह : जीवन का प्रवाह रोकना नहीं, समझना सीखो
"नदी कभी पहाड़ों से लड़कर समुद्र तक नहीं पहुंचती,
वह रास्ता बनाते हुए बहती रहती है।"
"अनुगच्छतु प्रवाह"
अर्थात् — प्रवाह के साथ चलो।
यह संस्कृत का छोटा सा वाक्य है, लेकिन अपने भीतर जीवन का एक गहरा रहस्य छुपाए हुए है।
अक्सर हमने देखा है कि जब भी जीवन हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता, हम बेचैन हो जाते हैं।
नौकरी न मिले तो दुख, रिश्ता टूट जाए तो दुख, योजना असफल हो जाए तो दुख।
हम जीवन से लड़ने लगते हैं।
लेकिन प्रकृति का नियम कुछ और कहता है।
नदी को देखिए।
जब उसके रास्ते में चट्टान आती है तो वह चट्टान से युद्ध नहीं करती। वह अपना मार्ग बदल लेती है, लेकिन बहना नहीं छोड़ती।
और अंततः वही नदी समुद्र तक पहुँच जाती है।
**"जो झुकता है वही टिकता है,
जो बहता है वही बढ़ता है।"**
मुझे अक्सर बाँस के वृक्ष का उदाहरण याद आता है।
आंधी आने पर विशाल वृक्ष टूट जाते हैं, लेकिन बाँस झुक जाता है।
आंधी के बाद वह फिर सीधा खड़ा हो जाता है।
जीवन में भी जो परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं, वे टूटते नहीं हैं।
इतिहास में भी यही प्रवाह दिखाई देता है
गौतम बुद्ध ने राजमहल छोड़ दिया।
यदि वे अपने पुराने जीवन से चिपके रहते तो शायद बुद्ध न बन पाते।
महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका की एक घटना ने बदल दिया।
उन्होंने परिस्थिति को स्वीकार कर उससे नया मार्ग बनाया।
ए.पी.जे. अब्दुल कलाम वायुसेना में चयनित नहीं हुए।
यदि वे उसी असफलता पर रुक जाते, तो भारत को मिसाइल मैन नहीं मिलता।
**"कभी-कभी जीवन आपको वह नहीं देता जो आप चाहते हैं,
क्योंकि वह आपको उससे बेहतर देने की तैयारी कर रहा होता है।"**
प्रकृति में हर जगह प्रवाह है।
जल चक्र देखिए।
बादल बनते हैं, बरसते हैं, नदियाँ बनती हैं, फिर समुद्र में मिल जाती हैं।
यदि पानी रुक जाए तो सड़ने लगता है।
बहता हुआ जल ही निर्मल रहता है।
इसी प्रकार मनुष्य भी जब पुराने दुःख, क्रोध और अहंकार को पकड़े रहता है, तो भीतर से भारी हो जाता है।
एक बार किसी ने एक वृद्ध संत से पूछा—
"जीवन में शांति कैसे मिले?"
संत मुस्कुराए और बोले—
"नदी से सीखो।"
व्यक्ति ने पूछा— "नदी क्या सिखाती है?"
संत बोले—
"वह हर क्षण आगे बढ़ती है। उसे पता है कि पीछे लौटना संभव नहीं। इसलिए वह शिकायत नहीं करती, बस बहती रहती है।"
**"अतीत एक किनारा है,
भविष्य दूसरा किनारा।
जीवन की नाव वर्तमान के प्रवाह में चलती है।"**
आज के समय में अधिकांश तनाव का कारण यही है कि हम जीवन को नियंत्रित करना चाहते हैं।
हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारी योजना के अनुसार हो।
लेकिन सत्य यह है—
जीवन एक नदी है, मशीन नहीं।
यह कभी सीधी नहीं बहती।
कहीं मोड़ आते हैं, कहीं भँवर आते हैं, कहीं झरने आते हैं।
और यही उसकी सुंदरता है।
एक छोटी सी कहानी
एक किसान का घोड़ा भाग गया।
लोग बोले— "बहुत बुरा हुआ।"
किसान बोला— "देखते हैं।"
कुछ दिन बाद वह घोड़ा कई जंगली घोड़ों के साथ वापस आ गया।
लोग बोले— "बहुत अच्छा हुआ।"
किसान बोला— "देखते हैं।"
फिर उसका बेटा घोड़े से गिरकर घायल हो गया।
लोग बोले— "बहुत बुरा हुआ।"
किसान फिर बोला— "देखते हैं।"
कुछ समय बाद युद्ध छिड़ गया और गाँव के सभी युवकों को सेना में भर्ती कर लिया गया, लेकिन घायल होने के कारण उसका बेटा बच गया।
जीवन का प्रवाह हमेशा उस समय समझ नहीं आता।
कई बार जो आज बुरा लगता है, वही कल किसी बड़े वरदान का कारण बन जाता है।
"अनुगच्छतु प्रवाह"
इसका अर्थ परिस्थितियों के सामने हार मान लेना नहीं है।
इसका अर्थ है—
परिस्थितियों को स्वीकार करके बुद्धिमानी से आगे बढ़ना।
नदी की तरह।
बिना रुके।
बिना शिकायत किए।
बिना अपने लक्ष्य को छोड़े।
अंतिम विचार
"जब जीवन की धारा विपरीत लगे,
तब संघर्ष करो पर कठोर मत बनो।
नदी की तरह बहो,
क्योंकि जो बहता है वही पहुँचता है।"
अनुगच्छतु प्रवाह।
प्रवाह के साथ चलो,
क्योंकि जीवन रुकने का नहीं, बहने का नाम है।
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"अनुगच्छतु प्रवाह"
नदी की तरह बहो,
क्योंकि जीवन का सौंदर्य ठहरने में नहीं,
निरंतर आगे बढ़ने में है।

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